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Intelligence and intellect is not by chance!

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Mahesh Bhatt


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प्रतीकात्मक प्रसिद्धि की चाहत

Posted On: 3 Mar, 2011  
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जनरल डब्बा में

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चकाचौंध के पीछे की हकीकत

Posted On: 7 Feb, 2011  
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मस्ती मालगाड़ी में

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आतंकवाद का हौव्वा

Posted On: 7 Jan, 2011  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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शांति की मुश्किल राह

Posted On: 29 Aug, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बॉलीवुड का संकट

Posted On: 27 Jul, 2010  
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मस्ती मालगाड़ी में

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[Sottishness and Glamour World] कला का काला यथार्थ

Posted On: 13 Jul, 2010  
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जनरल डब्बा में

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सूचना का वायरस

Posted On: 27 Jun, 2010  
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टेक्नोलोजी टी टी न्यूज़ बर्थ में

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शिवसेना के सामने शाहरुख

Posted On: 13 Feb, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Love Pakistan

Posted On: 25 Jan, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

लगता है आप समाचार नहीं देखते है क्या आप मालेगांव, अजमेर, समझौता एक्सप्रेस के बारे में कुछ नहीं जाने है चलिए आप कहेंगे की सब झूट है तो ज़रा बताये लिट्टे क्या था, क्या आप को भारत में उसके समथक नेताओ की सूचि पेश करूँ, अगर आप आतंवाद को धर्म से जोड़ते है और दिन रात इस्लामी आतंकवाद को कोसते है तो लिट्टे को हिन्दू आतंकवाद क्यों नहीं कहते आप को बतादे सब से पहला आत्मघाती दस्ता लिट्टे ने ही बनाया था , रही दिन्विजय सिंह की बात तो सच्चाई सब के सामने है दर्जनों आतंकी घटने ऐसी हुयी है जिनमे भगवा ब्रिगाड़े शामिल है , digvijay को मैं सही नहीं कहता लेकिन भगवा ब्रिगाड़े क्या कर रही है लगता है आप उनके बयान और लेख नहीं देखते है जो दिन रात इस्लाम को आतंवाद से जोड़ते है और खुद नफरत और और ज़हर का व्यापार कर रहे है, दिग्विजय ने एक बात क्या बयान कर दी दुनिया सर पर उठा ली आप लोगो ने , बाकी किसी के बयानों पर आप का धयान क्यों नहीं जाता ! यह सही है की जहाँ पेड़ो , पशु पंक्षियों की पूजा होती है उस धर्म अनुयायी आतंकवादी नहीं हो सकते लेकिन यह भी सच है की उस ही धर्म के मानने वालो ने १९८४ में क्या किया और गुजरात में क्या किया , कंधमाल में क्या किया शायद आप को मालूम हो या हो सकता है यह सब भी झूट हो ! सुरेश जी कहाँ तक आप सच को छुपायेंगे कट्टरपंथ सब धर्मो में है और बढ़ रहा है चाहे इस्लाम हो हिंदुत्व हो इसाई या और कोई भी

के द्वारा: Ramesh Singh

भट्ट साहब ,अभिवादन,आतंकवाद को प्रचारित ,प्रसारित करने का काम मीडिया करता है ,इसमें कोई संदेह नहीं परन्तु आतंकवाद के विरुद्ध जब तक सब एक साथ नहीं होंगें आतंकवाद का खत्म नहीं होगा.जब आस्तीन के सांप हों तो आतंकवाद कैसे समाप्त हो? मेरे विचार से सभी विचारधारा के लोग जिस दिन एक सुर में आवाज़ बुलंद करेंगें तभी कुछ संभव है.आपने प्राकृतिक आपदा सुनामी की तुलना आतंकवादी घटनाओं में मरने वाले लोगों से की है,उससे मै सहमत नहीं,प्राकृतिक आपदा से मरना और किसी गुंडे,आतंकवादी के हाथ से मरने में जमीन आसमान का अंतर है.आतंकवाद कायराना हरकत है,आपदा अपने हाथ में नहीं.आतंकवाद पर काबू करना इंसान के हाथ में है.कृपया बताएं आप कहाँ तक सहमत है मेरे विचार से.

के द्वारा: nishamittal

महेश जी, नमस्कार, कमाल के बुद्धिजीवी है आप...। मैं बहुत दिल से आपको गरियाना चाहता था, पर जब आपके विचारों को पढ़ा तो लगा मेरी सोच भारत-पाक रिश्तो को लेकर बहुत ही संकुचित है। वैसे आप जैसों का शांति का यह प्रयास बहुत ही सराहनीय है, लेकिन मैं अभी तक एक बात नहीं समझ पा रहा हूं कि क्या सीमा पर जाकर मोमबत्ती जलाकर शांति की कल्पना कभी यथार्थ रूप ले सकेंगी। अगर किसी बंदर के हाथ में अस्तुरा थमा दिया जाए तो उसका क्या हश्र होगा, इस पर एक कहावत बनी है..बंदर के हाथ में अस्तुरा तथा बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद आदि। पाकिस्तान की बुनियाद का आधार बंटवारा है, ऐसे में हम कब तक ऐसे नाटक करते रहेंगे। विचार व्यक्ति की व्यक्तगत धारा है..वह समूह का नेतृत्व कदापि नहीं कर सकती है..। आज कश्मीर जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए कौन दोषी है..। युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी हल नहीं है। युद्ध की संभावना को लेकर दोनों मुल्कों द्वारा भारी तादात में की जा रही हथियारों की खरीद से देश के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन सच यह है कि इसकी शुरूआत पाक द्वारा की गई है। पाक घायल वो सांप है, जो हर समय युद्ध की ताक में बैंठा हुआ है और मौका मिलने पर वह नहीं चूंकने वाला है। युद्ध की दहशत तो पाक की देन है भारतीयों पर। भारत के संदर्भ में पूरी दुनिया जानती है कि वह हमला जैसी किसी भी गतिविधियों पर ध्यान नहीं देता है..लेकिन दुश्मन के हमले से बचाव की उपजी मानसिकता के चलते न चाहते हुए भी युद्ध का साजो सामान खरीदना पड़ रहा है। आपके ही शब्दों पाक ने राहत अली को रा का ऐजेंट करार दिया जाना उसकी मानसिकता को दशार्ता है। भारतीय फिल्मों पर रोक, तथा समय समय पर कोई न कोई बखैड़ा कर देना उसकी फितरत रही है। आप जैसों के प्रयासों की भारतीय राजनीति ने कभी भी निंदा नहीं की है। लेकिन पाक में ऐसा नहीं हो रहा है। आपको हम डैडी फिल्म के चलते बहुत ही स्नेह से देखते रहे है..। हालाकि दबंग चीन के आगे भारत की बेबसी को देखकर बड़ी खुन्नस होती है..लेकिन अब समझ में आ रहा है कि हर कमजोर को दबंग दबाकर रखता है। जैसे भारत पाकिस्तान पर और चीन भारत पर अपना रुआब झाड़ता रहता है। चीन अक्सर हमारे यहां बिन बुलाए मेहमान की भांति घुस आता है और फिर जाने का नाम नहीं लेता है..उस पर भारतीय संसद की गूंगी प्रवृत्ति पर बड़ी खींज आती है, लेकिन फिर जेहन ें 1962 का चित्र याद आता है..उसकी ताकत के आगे हम सब क्यों गूंगे हो जाते है..क्यों नहीं आप जैसे बुद्दिजीवी लोग भारत चीन सीमा विवाद पर तिब्बत मामले पर अपनी आवाज को इतना बुलंद करते हो कि दुनिया आपके पर्रयासों की मुक्त कंठों से प्रसंशा करे।

के द्वारा: Ashok Singh Bharat Dainik Jagran

महेश जी, शान्ति की राह कभी भी आसान नहीं रही है। जब भी देश या दुनिया में अशांति फैलती है तो हमें शांति की पुनर्स्‍थापना की जरूरत महसूस होती है। ऐसा सोचने वाले आप अकेले नहीं हैं, लेकिन ऐसा सोचने बाद शांति की खोज में निकलने वाले आप जैसे विरले ही हैं। ऐसे बहुत से मौके आए हैं जब आपने जनसमूह की धारा के उलट बात कहने का साहस दिखाया है, और सच को सामने किया है। यही कारण है कि आप विचारों की लीक पकडकर चलने वाले बुद्धिजीवियों की बिरादरी के भीकोपभाजन बनते रहते हैं। लेकिन मेरा स्‍पष्‍ट मत है कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति को अपनी सोच के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए और अपनी बात कहने का साहस भी रखना चाहिए। जहां तक मैं समझता हूं भारत और पाकिस्‍तान की जनता समान रूप से शांति की पक्षधर है लेकिन सियासत उनके बीच में हमेशा दीवार बनकर खडी रहती है। यही कारण है कि जब भी भारत और पाकिस्‍तान के बीच मधुर रिश्‍तों की वकालत होती है सियासत को पंख मिल जाते हैं। हमें अपने संकल्‍पों के जरिए इस हकीकत को बदलने का जोखिम उठाना ही होगा। इसी से शांति और सद़भाव की नयी इबारत लिखी जा सकेगी। संजय मिश्र

के द्वारा: संजय मिश्र

के द्वारा: Ashok kumar

आदरणीय महेश भट्ट जी, सादर नमस्कार, जैसा की मेरे दादाजी (एक शिक्षाविद) कहा करते हैं कि " शिक्षा वह होती है जो सवाल करना सिखाए, वह नहीं जो दूसरों की जानकारी हमारे अन्दर स्थानान्तरित करे। शिक्षक यही काम करता है। वे ही शिक्षक नहीं होते जो किसी संस्थान में नौकरी करते हुए छात्रों को कोर्स के पाठ समझने, स्मरण करने और परीक्षा में लिखने का हुनर सीखने में सहायता करते हैं। शिक्षक कुरेदता है। Education destabilizes." आधुनिक सुचना तंत्र महज dissimination of information के तहत कार्य करता है, इसमें बहुत सारी सुचना का समायोजन एक साथ जरूर हो जा सकता है पर इसका संकलन एवं आबंटन सुनिश्चित करना एक चुनौती होती है | इसके लिए व्यापक तकनीकी जानकारी रखने वाले लोगों का टीम होना चाहिए जो कि जरुरतमंदों तक त्वरित गति से सुगमता पूर्वक उनके जरूरत कि जानकारी पहुंचा सके| अभी इस दिशा में काम होना बाकी है | वेब पर की सूचनाओं के महाजाल में भटकाव को रोकना ऐसी ही "may i help u" जैसी टीम का ज्यादा से ज्यादा होना अति आवश्यक है जिससे समय के बचत के अलावे सूचनाओं का महादान सटीकता से प्रेषित हो सके | साधुवाद |

के द्वारा: Shwet Brata Jha

सर जी अभिवादन आपका लेख पढकर यह बात समक्ष मे आ गई कि इन्‍टरनेट सर्फिग भी एक प्रकार एडिक्‍सन है। हम नेट के एडिक्‍ट बनते जा रहे है। जागरण जंकसन पर कान्‍टेस्‍ट चल रहा है कई ब्‍लागर्स इस प्रकार की प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त कर रहे है जैसे कि उनके जीवन का एकमात्र उददेश्‍य किसी प्रकार इस प्रतियोगिता को जीतना हो। कुछ लोग इतने ज्‍यादा ब्‍लाग पोस्‍ट करते हैं कि यह समझ मे नही आता कि वे लिखने पर कितना समय खर्च करते है। खाली समय मे मै भी अक्‍सर नेट पर बैठना प्रिफर करती हूं। आपकी बात सौ प्रतिशत सही है। सूचना क्रान्ति वाइरस की तरह हम पर हमला कर रहा है और हम उसके शिकार होते जा रहे है। हम नई पीढी को इससे बचाना होगा।

के द्वारा: Anuradha chaudhary

भट्ट साहब दैनिक जागरण में आपका लेख पढ़ा ,पहला सवाल यही उठा की हम लोग ,आप जैसे लोगो को क्यों पढ़ते है? आपने एक सच्चाई बयां की कि बाल ठाकरे जो बयां करते है वही इस देश के लोगो कि भी भावना है , तो मै दो बाते कहना चाहूँगा एक तो ये कि बाल ठाकरे इस देश कि जनता के प्रतिनिधि नहीं है वो हमारे विचारो का प्रतिनिधित्व नहीं करते , दूसरी बात ये है कि ये हमारा सौभाग्य है कि पकिस्तान के प्रति इस देश कि बड़ी संख्या वैसी ही राय रखती है ,वरना आप जैसे महान विचारको ने राष्ट्रवाद और आत्म- सम्मान कि भावना को ख़त्म कर देने कि कसम खा राखी है . भट्ट साहब क्यों कभी हम आपसे या शाहरुख़ खान के मूह से ये नहीं सुनते .. कि संसद के हमलावरों को फ़ासी दी जाये , क्यों नहीं आप अपने पाकिस्तानी मित्रो से ये कहते है कि मुंबई के हमलावरों को सजा दिलाने के लिए या सरबजीत कि रिहाई के लिए पकिस्तान में आन्दोलन करे , आप क्यों नहीं कहते कि अजमल कसाब को सजा दी जाये ,.. आप आप कश्मीरी पंडितो पर होने वाले अत्याचारों पर क्यों नहीं बोलते , आप मलेशिया में हजारो हिन्दू मंदिरों के तोड़े जाने पर सरकार कि नपुंसकता पर क्यों नहीं बोलते??? भारत पर लगातार हो रहे पाकिस्तानी आघात पर आप या शाहरुख़ क्यों नहीं कहते ,,तब क्यों नहीं याद आता है कि आप इस देश कि धरोहर है ..तब आपका साहस कहा खो जाता है , आपको एक मोहसिन खान याद आता है , आपको वो सैकड़ो पाकिस्तानी कलाकार याद नहीं आते जिन्हें भारत ने सर आँखों पे बिठाया जो यहाँ से नाम पैसा शोहरत सब कम कर गए . पकिस्तान से घ्रिडा शिव सेना का तुरुप का इक्का है तो पकिस्तान से ये गैरराष्ट्रवादी प्रेम जो हमारे प्रगतिशील विचारको में पनप रहा है उसे क्या कहे.....

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

के द्वारा: रंजन

के द्वारा: Pravin Kumar

हो सकता है कि मेरी भाषा कुछ कठोर हो जाए किन्तु ज़रा ध्यान दीजिएगा. देखिए दोस्ती और सम्बन्ध के लिए दिलों में जगह होनी चाहिए. हमारे पास सहस्त्राब्दियों से इस बात का अनुभव है कि हम दुश्मनों को भी गले लगाते रहे हैं. हम कभी भी आक्रमणकारी नहीं रहे सिर्फ प्रतिरोध के लिए तलवार उठी है हाथों में. तो कौन सिखाएगा हमें कि हमें नरमी से पेश आना चाहिए, या कि हमें ही पहल करनी चाहिए. वह तो हम बिना सिखाए भी पिटते रहे हैं. लगता है कि हमें लात खाने की इतनी आदत हो चुकी है कि जब तक हर सुबह कोई लातियाने वाला मिलता नहीं तब तक चीख-पुकार मचाए रहते हैं. आखिर खोज ही लेते हैं तमाचे मारने वालों को. तसल्ली के लिए क्या कुछ नहीं करना होता है. जब लाख मिन्नतों के पश्चात भी कोई पीटने के लिए नहीं तैयार होता तो हमारे मानवाधिकारवादी हमारी पैरवी के लिए खड़े हो जाते हैं कि पीटो भई पीटो. अगर नहीं पीटोगे तो तो तुम्हारे सामान्य मानवाधिकार का हनन हो जाएगा. कौन कहता है कि पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध रखने के लिए हमें उसके तलवे चाटने चाहिए. कम-से -कम अब तो बख्श दीजिए हमें और छोड़ दीजिए हमें हमारे हाल पर.

के द्वारा: Ram Kumar Pandey

अमन की आशा एक अच्छा कांसेप्ट है , पर आशा के साथ प्रयास भी होने चाहिए दोनों तरफ से, एक तरफ से सर झुके और दुसरे तरफ से तलवार चले तो कब तक अमन रहेगा...? ये शब्द भी बड़ा सुन्दर है लव पकिस्तान , ये तो सही है की प्यार अँधा होता है इसमें अछे बुरे का ख्याल नहीं होता. इसका व्यावहारिकता और वास्तविकता से सम्बन्ध नहीं होता है और इंसान खयालो में सेतु बनाने लगता है , पर मेरी समझ में ये नहीं आता की हम केवल भावुक होकर रोने क्यों लग जाते है कभी गुस्सा क्यों नहीं दिखाते .हमारे स्वप्न्द्रष्टाओ के कितने ऐसे सेतु पकिस्तान तोड़ चुका है . जिस जिहाद से पकिस्तान आज भयाक्रांत है उसे जन्म उसी ने दिया है ये बिलकुल भस्मासुर वाला हाल है ..क्योकि आज खुद पकिस्तान इनसे सबसे ज्यादा परेशां है . अस्थिर पकिस्तान भारत ने कभी नहीं चाहा. मगर पकिस्तान की कोशिशे हमेशा भारत को अस्थिर करने की ही रही है .

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

हमारे देश में विद्वानों का एक ऐसा वर्ग है , जो अपनी विद्वता दिखाने के लिए बार बार पकिस्तान से सम्बन्ध सुधारने के लिए भारत को प्रयास करने कि सलाह देता रहता है ..मेरी समझ में ये नहीं आत कि आखिर अबतक भारत ने जो प्रयास किये है उनपे वे निगाह क्यों नहीं डालते..?मुंबई हमलो के बाद जो भारत लगातार पकिस्तान को पहले कार्यवाही फिर बात चित करने की बात सुनाता रहता था ..उसने खुद ही बात चित के लिए पकिस्तान के सामने घुटने टेक दिए . इसपे इतराते हुए कल युसूफ रजा गिलानी ने जो बयां दिया कि " भारत को अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे झुकना ही पड़ा और वार्ता के लिए पहल करनी ही पड़ी " इसपे तो उन्हें खुश होना चाहिए अब क्या चाहते हो भैया क्या पाकिस्तान के पैर पकड़ के कहना पड़ेगा कि आतंकवादी मत भेजो, या मुंबई हमलो पे कहा जाये कि जो हो गया सो हो गया हम फिर दोस्त बन जाते है . इस तरह से हम कैसी महा शक्ति बनने का सपना देख रहे है . इसका मतलब युद्ध नहीं है ..पर इतना रुतबा होना चाहिए कि आप अपनी तरफ से शर्ते रख सके . अमेरिका के दबाव से जितना हम डरते है उतना तो पकिस्तान भी नहीं डरता होगा . हमारा रवाया अगर ऐसा ही रहा तो पकिस्तान हमारे लिए हमेशा सर दर्द बना रहेगा और हम इसकी कीमत चुकाते रहेंगे , हमारे कुछ सेलेब्रिटी जो पकिस्तान का दौरा कर के आते है वे वह के स्वागत से इतने अभिभूत और भावुक हो जाते है की उन्हें पकिस्तान की सारी हरकते भूल जाती है.. मगर यहाँ सवाल मात्र पडोसी का नहीं है देश की सुरक्षा ,एकता और अखंडता का है, एस. शंकर जी की बात का मै समर्थन करता हु ...क्योकि भावना के आधार पर एकतरफा दोस्ती की कोशिशे अन्तराष्ट्रीय मामलो में केवल नुक्सान और खतरे ही बढ़ाएंगी , महेश भट्ट जी जिन जिहादी तत्वों की बात कर रहे है उन्हें रोटी वही ISI देती है, जिसका नियंत्रण पाकिस्तानी सेना संभालती है और पाकिस्तान में सरकारे किसी की रहे पर नियंत्रण सेना का ही होता है ...महेश जी की एक बात पर ध्यान दिलाना चाहूँगा ..की अमेरिका के हथियार उद्योग को बढ़ने के लिए भारत कोई नफरत का खेल नहीं खेल रहा .ये खेल सिर्फ पाकिस्तान खेल रहा है .भारत से किसी को भी कोई खतरा नहीं हो सकता है ये आपको समझ लेना चाहिए...भारत की और पकिस्तान की सुरक्षा चिंताए अलग अलग है , भारत ने किसी पर आक्रमण नहीं किया है बल्कि सिर्फ थोपे गए युद्धों को झेला है , तो उसके लिए अपने सैन्य क्षमताओ का विकास समय की मांग है .

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

बात मुंबई हमलो के बाद की है मै एक पाकिस्तानी दोस्त से चैटिंग कर रहा था .मैंने पूछा की कसाब बहुत युवा है इतनी कम उम्र में इतना बड़ा दुस्साहस उसने कैसे कर दिया...तो मेरे पाकिस्तानी मित्र ने (जो खुद भी कम उम्र का ही था लगभग १८ साल का ) जवाब दिया की "हो सकता है उसके साथ कुछ ज्यादती हुई हो" .. इसके बाद एक लड़की जोकि पाकिस्तान में ही पढाई कर रही थी उसने अचानक मुझसे पूछ लिया ..कि "मैंने सुना है की हिन्दू बहुत शराब पीते है और मुसलमानों पे अत्याचार करते है ?" ये सवाल उन्होंने बेहद सहजता से पूछे और यकीं मानिये इसमें उनका कोई दोष नहीं ..पर एक बात गौर करने वाली है की वे तालिबानी नहीं ,isi वाले नहीं और न ही वो किसी आतंकवादी गुट से थे , वे थे ,पकिस्तान के आम नागरिक जिनके दिलो में भारत के प्रति जहर भरा गया है वहा की मीडिया और राजनीती द्वारा , यहाँ तरुण जी की बात से मै एकदम असहमत हु की ९०% पाकिस्तानी भारत को पसंद करते है...तरुण जी , पाकिस्तान का जन्म ही हिन्दुस्तान विरोध पर हुआ है , वहा की राजनीती भारत विरोध और कश्मीर की आग को भड़काकर चलती है भारत विरोध वह धुरी है जिसके चारो ओरे पाकिस्तानी राजनीती अबतक चली है और इसके प्रमाण तो हम १९४७ से ही देखते आ रहे है .ये सही है की सभी पाकिस्तानी भारत विरोधी नहीं है और न ही मै पकिस्तान का विरोधी हु . पकिस्तान अमेरिका पर आश्रित है इसलिए नहीं कि उसे भारत से खतरा है बल्कि इसलिए , कि उसे भारत से चिढ है , वो भूखो मर जायेगा पर अमेरिकी सहायता के धन से हथियार ही खरीदेगा. ये उसकी प्रवृत्ति बन चुकी है .जिना से लेकर जरदारी तक सभी पाकिस्तानी हुक्मरानों ने भारत के लिए कांटे ही बिछाए है ...तो सवाल उठते है कि अपने पैरो को जख्मी कर के बार बार उस पार क्यों जाना ? एक बार उन्हें भी आने दो पहल करने दो. दोस्ती कि . मुझे नहीं लगता अटल जी ने जैसा प्रयास संबंधो को सुधारने में किया वैसा किसी और ने किया पर बदले में धोखा ही mila, भारत के लिए पकिस्तान केवल छल ही करता रहा है , सम्बन्ध सुधरने चाहिए मगर एकतरफा प्रयास कबतक ? इससे अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर आप हसी के पात्र बन जायेंगे.

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

To love Pakistan is one sided affair, a 50 % love. It is a futile ' Aman-Ki-Aasha '. Indo- Pakistan conflict is rooted in Indian history and in Jinnah's two nation theory. According to Jinnah's theory Hindus and Muslims are two different nations who are incompatible This is not to deny that there are well meaning people on both sides but a large section of fanatic jihadi elements, Talibans, al-Quaeda, ISI and Pakistan army, will not let any rapproachment between India and Pakistan take place. During last more than 60 years since independence, India has made several very sincere attempts to establish peace and friendship with Pakistan,but of no avail. There has been no reciprocal initiative from Pakistan side. Mahatma Gandhi never wanted partition of India. and infact, expressed a desire to settle down in Pakistan after partition became a fact of life, with a view to work towards Indo-Pakistan friendship.. Gandhi ji was a geat well wisher of Pakistan. Among our Prime Ministers Pt Nehru, Morarji Desai, Inder Gujral, Atal Behari Vajpayee and now Manmohan Singh have made very sincere attempts to establish cordial relations with Pakistan. Infact, it is Vajpayee who stated that one can change a friend but not neighbour. It has to be realised that there is no option but to live in peace with a neighbour. Inspite of, all our efforts to establish peace, we faced four wars waged against us by Pakistan in 1947, 1965, 1971 and Kargil , In Pakistan, politics revolves around hatred towards India and poisonous anti India propaganda. Let someone tell me, where we have been lacking in our efforts and what more can we do. It sems to me that we are destined to remain in perpetual conflict with Pakistan till eternity unless the concept of jihad is given up..The root cause lies in incompatibility of two civilisations, the two nation theory, in Jihad and in history. One can not find a solution by ignoring reality.

के द्वारा: Dr S Shankar Singh




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